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क्यों न प्रारब्ध की कठपुतली ही बन जाएँ…

20 Mar 2026
मनुष्य या साधक अपने जीवन को अपनी योजनाओं, अपनी बुद्धि और अपनी मेहनत से संचालित मानता है... पर जीवन की गहराइयों में उतरते ही यह बोध धीरे-धीरे प्रकट होने लगता है कि हमारे होने से कहीं अधिक शक्तिशाली कोई और धारा हमें समय के साथ बहा रही है... कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें न टाला जा सकता है और न बदला जा सकता है... वे आती हैं... घटती हैं और हमारे भीतर स्थायी संस्कार बनाकर चली जाती हैं... यही प्रारब्ध है... पूर्व जन्मों के अधूरे अनुभवों का इस जन्म में पूर्ण होना... प्रारब्ध केवल परिस्थितियों के रूप में नहीं आता है... वह कई बार संबंधों का रूप भी धारण कर लेता है... आश्चर्य इस बात का होता है कि सबसे निकट के संबंध जिनसे हम सर्वाधिक प्रेम, आशा और अपेक्षा रखते हैं... वही कई बार हमारे जीवन के सबसे बड़े कष्ट का कारण बन जाते हैं... तब धीरे-धीरे यह समझ उभरती है कि ये संबंध महज एक संयोग नहीं है....संस्कार हैं... वे आत्मा के स्तर पर पहले से तय हुई मुलाकातें हैं जिनसे बचना संभव नहीं है... चाहे हम कितने ही समझदार, सफल या आध्यात्मिक क्यों न हो जाएँ... मनुष्य कितना भी बुद्धिमान हो... कितना ही सामाजिक चतुर हो... उसके पास कितना ही धन, पद या प्रतिष्ठा क्यों न हो... प्रारब्ध की पकड़ से वह मुक्त नहीं हो सकता है... हम घटनाओं की पटकथा नहीं लिखते है...हम केवल उसमें अभिनय करते हैं और जब साधना के मार्ग पर चलते-चलते बार-बार वही पीड़ाएँ, वही उलझनें, वही असहायता सामने आती है... तब भीतर से एक प्रश्न उठता है.... “क्या मेरे नियंत्रण में सचमुच कुछ भी नहीं है...?” उत्तर बहुत शांत है... घटना आपके नियंत्रण में नहीं है पर प्रतिक्रिया आपके नियंत्रण में है... लिखा हुआ घटेगा ही पर उसके भीतर आप कितना टूटते हैं...? कितना जागते हैं...? यही आपकी साधना है... यही वह बिंदु है जहाँ “प्रारब्ध की कठपुतली” बनने का भाव जन्म लेता है... कठपुतली होना अपमान नहीं है... यह अहंकार की सबसे गहरी तपस्या है... जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि डोर हमारे हाथ में नहीं है... तब हम जीवन से संघर्ष करना छोड़ देते हैं... पर यह समर्पण निष्क्रियता नहीं है यह सजगता का उच्चतम रूप है.... इसका अर्थ यह नहीं कि हम कुछ भी करते जाएँ बल्कि इसका अर्थ यह है कि हम जो भी करें... वह ईश्वरीय नियमों के अनुरूप हो... न कि केवल सांसारिक प्रतिक्रियाओं के अनुसार... साधक के लिए सबसे बड़ा धर्म यही है कि वह प्रारब्ध को भोगते हुए नया प्रारब्ध न रचे... पीड़ा आए तो भीतर द्वेष न जन्म ले... अपमान आए तो अहंकार न जागे... त्याग करना पड़े तो भीतर प्रतिशोध न पनपे... यदि हम प्रारब्ध को भोगते समय क्रोध, घृणा, छल या बदले की भावना पाल लेते हैं तो हम एक और जन्म का बीज बो देते हैं... पर यदि हम उसी पीड़ा में तटस्थ रहना सीख लें तो वही प्रारब्ध मुक्ति की सीढ़ी बन जाता है... कठपुतली का नाचना भी एक कला है... वह डोर के अनुसार चलती है पर उसका नृत्य सौंदर्यपूर्ण होता है... उसी प्रकार साधक का जीवन भी प्रारब्ध के अनुसार चलता है पर उसकी चेतना करुणा, विवेक और मौन से भरपूर होती है... तटस्थता यहाँ निष्क्रियता नहीं है बल्कि उच्चतम सक्रिय सजगता है... जहाँ मनुष्य भीतर से स्थिर रहता है, चाहे बाहर कितना ही तूफ़ान क्यों न हो... जब हम अपनी पूरी डोर सृष्टि के नियमों और ईश्वरीय हाथों में सौंप देते हैं तब जीवन का संघर्ष साधना में बदल जाता है... तब हम संसार के नियमों से नहीं बल्कि अध्यात्म के नियमों से चलने लगते हैं और यही वह क्षण है जब प्रारब्ध हमें बाँधना छोड़ देता है और हमें शुद्ध करना शुरू कर देता है... शायद इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा... क्यों न हम प्रारब्ध की कठपुतली ही बन जाएँ… पर ऐसी कठपुतली... जो न रोती है और न लड़ती है... बस नृत्य करती है... समर्पण के संगीत पर... तटस्थता की लय में... और मुक्ति की दिशा में... क्यों न हम प्रारब्ध की कठपुतली ही बन जाएँ… प्रो. सविता शाही डिवाइन वर्ल्ड मिशन
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