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नवसंवत्सर की दिव्य प्रभात वेला

19 Mar 2026
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का यह पावन दिन पंचांग का केवल एक तिथि नहीं है... यह चेतना के नवोदय का दिव्य उद्घोष है... यह उद्घोष सृष्टि के स्पंदन का पुनर्जागरण है... यह आत्मा के भीतर सुप्त पड़े प्रकाश का जागरण है... विक्रमी संवत् 2083 का यह शुभारंभ हमें यह स्मरण कराता है कि हिंदू नववर्ष केवल समय का परिवर्तन नहीं होता है बल्कि अस्तित्व की दिशा का परिवर्तन होता है... जीवन दृष्टि, भाव दृष्टि और चेतना दृष्टि का एक गहन पुनर्संस्कार है... भारतीय कालगणना मात्र तिथियों का अनुक्रम नहीं होता है... यह चेतना की धारा का विज्ञान है... चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि के आदिदिवस के रूप में स्मरण किया जाता है क्योंकि यह वह क्षण है जब सृजन की मूल ऊर्जा पुनः स्पंदित होती है... यह केवल एक नववर्ष का आरंभ नहीं होता है... यह समस्त व्यक्तियों के लिए ब्रह्मांडीय लय के साथ स्वयं को पुनः संरेखित करने का अवसर है... अतः यह कहना अधिक सत्य है कि यह हिंदू नव वर्ष से वर्ष प्रारंभ नहीं होता है... यह चेतना पुनः जागरण का प्रारंभ होता है... जब प्रकृति चहुंओर नवपल्लव धारण करती है... जब सूखी शाखाओं में पुनः रस का संचार होता है... जब वायु में एक सूक्ष्म मधुरता व्याप्त होती है... तब यह केवल बाहरी परिवर्तन का संदेश लेकर नहीं आती है बल्कि भीतर की चेतना को भी एक मौन संकेत देता है कि जो जड़ हो गया है... उसे त्यागो... जो बोझ बन गया है..उसे छोड़ो... जो असत्य है... उसे पहचानो... इस नव वर्ष में नवजीवन को धारण करो.. यही इस नवसंवत्सर का आंतरिक आह्वान है कि हम केवल नया वर्ष न प्रारंभ मानें... हिंदू संस्कृति का पालन करते हुए स्वयं को पुनः जन्म दें.. यह नववर्ष इसलिए अद्वितीय है क्योंकि इसके प्रथम दिन का प्रारंभ ही माँ की आराधना से होता है... यह वह परंपरा है जहाँ वर्ष का प्रारंभ आध्यात्मिक शक्ति के स्मरण से होता है... उस आदिशक्ति का स्मरण जो सृजन का मूल है... जो संरक्षण की करुणा है... जो चेतना का अंतिम आधार है... जब साधक वर्ष के प्रथम दिवस माँ के चरणों में बैठता है तो वह पूजा व अर्चना के साथ अपने अस्तित्व का समर्पण करता है... वह मौन में स्वीकार करता है कि " यह वर्ष मेरा नहीं माई की कृपा से देखने का सौभाग्य मिला है... अतः यह नया वर्ष भी माई को समर्पित... माई की कृपा से जीवन साधनामय हो जाए... और यहीं इस नववर्ष का गूढ़तम रहस्य प्रकट होता है कि यह वर्ष आरंभ नहीं होता है... हिंदू नव वर्ष देवी देवताओं को अर्पित होता है... पूज्य गुरु जी द्वारा हिंदू नव वर्ष के लिए समय-समय पर निर्देश दिए जाते हैं... गुरुदेव के यह निर्देश केवल आचरण के नियम नहीं होते हैं बल्कि वह साधना के सूक्ष्म कवच होते है... चेतना को संतुलित और संरक्षित रखने वाले ऊर्जा सूत्र होते है... इस दिवस पर किए जाने वाले सरल आचरण जैसे पीला या भगवा वस्त्र धारण करना, तिलक लगाना, दीप प्रज्वलित करना, घर को सजाना, ध्वज स्थापित करना आदि ये सब केवल परंपराएँ नहीं हैं बल्कि चेतना को एक दिशा देने वाले संकेत हैं... जब साधक इनका पालन करता है... तब वह अपने भीतर अग्नि तत्त्व, प्रकाश तत्त्व और जागरण तत्त्व को सक्रिय करता है... दीप केवल अंधकार हटाने का साधन नहीं होता है... वह स्वयं के भीतर के अज्ञान को भी स्वीकार कर उसे आलोकित करने का साहस है... घर की सजावट केवल बाहरी सौंदर्य व सज्जा नहीं होती है बल्कि अपने जीवन द्वार को शुभता और दिव्यता के स्वागत हेतु खोलने का संकेत होता है... भगवा ध्वज केवल एक प्रतीक नहीं है बल्कि यह उद्घोष है कि हम अपनी चेतना, अपनी परंपरा, अपनी संस्कृति और अपने आध्यात्मिक मूल से जुड़े हुए हैं... किन्तु साधक के लिए यदि यह सब केवल बाहरी आचरण और नियम मात्र ही रह जाए और भीतर कोई परिवर्तन न हो तो यह उत्सव अधूरा रह जाता है... इसलिए यह नवसंवत्सर एक गहन आंतरिक अनुशासन का भी दिवस है... एक ऐसा क्षण जहाँ साधक स्वयं के सामने खड़ा होकर स्वयं से प्रश्न करता है कि क्या मेरा मन अधिक शांत हुआ है...? क्या मेरी वाणी में करुणा और मधुरता आई है...? क्या मेरी अनावश्यक प्रतिक्रियाएँ कम हुई हैं... ? क्या मैं अब भी परिस्थितियों का दास हूँ...? यहीं साधक को गुरु आशीर्वाद से यह बोध प्रकट होता है कि नववर्ष का वास्तविक उत्सव स्वयं का साक्षात्कार है... यह नवसंवत्सर हमें केवल संकल्प और साधना व्रत लेने का आह्वान नहीं करता है... सामान्य व्यक्ति वर्ष के लक्ष्य निर्धारित करता है... परन्तु साधक स्वयं को परिवर्तित करने का व्रत लेता है... यह व्रत बाहरी उपलब्धियों का लेखा-जोखा नहीं होता है... यह तो अंतः करण रूपांतरण का होता है... एक दोष को छोड़ने का... एक गुण को विकसित करने का... और यह भी स्मरण रखना आवश्यक है कि साधना कभी केवल व्यक्तिगत नहीं होती है... एक साधक का जागरण उसके परिवार को स्पर्श करता है... परिवार समाज को... समाज राष्ट्र को... इस प्रकार एक जागृत चेतना ही सामूहिक चेतना के उत्थान का आधार बनती है... हिंदू नववर्ष की एक और अद्वितीय विशेषता यह है कि यह केवल समय के परिवर्तन का उत्सव नहीं है बल्कि जीवन के पुनर्संरेखन का अवसर है... जहाँ अन्य नववर्ष मुख्यतः बाहरी उल्लास,दिखावटी पार्टी और क्षणिक आनंद पर आधारित होते हैं... वहीं भारतीय नवसंवत्सर प्रकृति, सृष्टि चक्र, ऋतु संतुलन और साधना दृष्टि के साथ जुड़ा हुआ है... यह मनुष्य को केवल उत्सव मनाने के लिए नहीं ही अनुमति देता है बल्कि स्वयं को रूपांतरित करने के लिए प्रेरित करता है... यही इसकी श्रेष्ठता है... यही इसकी विशिष्टता है... यह केवल समय का परिवर्तन नहीं है...यह चेतना को बदलने का निमंत्रण देता है... धीरे-धीरे साधक अनुभव करता है कि यह हिंदू वर्ष में केवल माँ की पूजा नहीं होती है... माँ का आशीर्वाद जीवन में प्रवाहित हैं... नव वर्ष में मां के आशीर्वाद का अनुभव अद्भुत होता है... सुख में भी माँ... दुःख में भी माँ... प्राप्ति में भी माँ...अभाव में भी माँ... हर अनुभव में माँ... तब हम सब हिंदुओं के लिए यह नववर्ष एक तिथि नहीं रह जाता है... वह माँ की चेतना में प्रवेश बन जाता है और तब यह सत्य स्पष्ट होता है कि जब वर्ष माँ को समर्पित होता है.. तब जीवन साधनामय हो जाता है... यह तिथि हमें एक अत्यंत गहरे सत्य का बोध कराता है कि नया वर्ष वाह्य परिवर्तन का सूचक नहीं है ... नया वर्ष भीतर से जगाकर रूपांतरित करता है... यदि साधक की चेतना अपरिवर्तित रही तो वर्ष बदलने से कुछ नहीं बदलेगा... पर यदि माँ की कृपा से दृष्टि बदल गई... तो वर्ष का प्रत्येक क्षण नवसंवत्सर बन सकता है... गुरु आशीर्वाद से इस दिव्य प्रभात पर हम एक मौन व्रत लें कि यह वर्ष आत्म परिष्कार का हो... केवल गति का नहीं... दिशा का होगा... केवल प्रयास का नहीं... समर्पण का होगा... हम अपने भीतर के द्वेष को क्षमा में... अहंकार को विनम्रता में... भय को विश्वास में और अस्थिरता को मौन शांति में रूपांतरित करने का संकल्प लें... माँ पीतांबरा से यही प्रार्थना है कि यह नवसंवत्सर हमारे भीतर के अंधकार को आलोकित करे... हमारे जीवन को संतुलन, शक्ति और करुणा से भर दे... हमें उस साधना मार्ग पर स्थापित करे... जहाँ हमारा प्रत्येक विचार... प्रत्येक कर्म... प्रत्येक श्वास साधना बन जाए... प्रो. सविता शाही डिवाइन वर्ल्ड मिशन
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