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गुरु शिष्य संबंध में पारदर्शिता की साधना
“Every blog is a step closer to inner awakening.”
“हर ब्लॉग आत्मिक जागृति की ओर एक कदम है।”
गुरु शिष्य संबंध में पारदर्शिता की साधना
29 Mar 2026
गुरु शिष्य संबंध कोई साधारण सामाजिक या शैक्षिक अनुबंध नहीं होता है... यह चेतना के उस उच्चतम तल का स्पंदन है जहाँ आत्मा अपनी मूल आकांक्षा (मुक्त होने की ) को गुरु की कृपा-संरचना में पूर्ण समर्पण के साथ प्रकट करती है... यह संबंध अपने दिव्य स्वरूप में तब प्रकट होता है जब उसमें पारदर्शिता की साधना जीवंत हो उठती है... पारदर्शिता केवल सत्य बोलना नहीं है... यह समग्र अंतःकरण को निर्वस्त्र कर गुरु के श्रीचरणों में अर्पित कर देने की दुर्लभ क्षमता है... यह साधना शिष्य को भीतर से तराशती है... जब शिष्य अपने हृदय की गहनतम गुहाओं में छिपे संशयों, भय, आकांक्षाओं, असफलताओं और अनुभवों को बिना संकोच गुरु के समक्ष रख देता है.... यह सोचे बिना कि गुरु क्या सोचेंगे...? तब वह केवल संवाद नहीं करता है बल्कि अपनी आत्मा की ज्योति को गुरु के तपोदीप्त नेत्रों में अर्पित कर देता है... यही वह क्षण है जब गुरुशिष्य संबंध शब्दों से परे जाकर मौन की मर्मगामी अनुभूति बन जाता है... जब पारदर्शिता श्रद्धा से आगे बढ़कर उस समर्पण तक पहुँचती है... जहाँ शिष्य गुरु की दृष्टि के सामने निर्विकल्प, निर्भीक और निःशेष होकर खड़ा रहता है...तब न कोई आवरण शेष रहता है और न कोई प्रस्तुति... केवल शुद्ध अंतःकरण और संपूर्ण सत्य... उस क्षण गुरु की दृष्टि मात्र दृष्टि नहीं रहती है... वह छलरहित आत्मा पर अनुग्रह की अनवरत अमृतवर्षा बन जाती है... इस अवस्था में संवाद मौन को भी पार कर जाता है... शब्द अर्थ नहीं बल्कि आराधना बन जाते हैं... शिष्य के भाव मंत्रस्वरूप हो उठते हैं और उसकी वाणी कृतज्ञता का यज्ञकुंड बन जाती है... गुरु की कृपा तब साधना, विचार, व्यवहार, संस्कार और चेतना के प्रत्येक तल पर एक अदृश्य ज्योति की तरह प्रवाहित होने लगती है... जब गुरु के समर्पण में अहंकार की एक भी चिनगारी शेष नहीं रहती है तब द्वैत का कोई स्थान नहीं रह जाता है... केवल एकत्व की सुगंध बचती है... गुरु और शिष्य की चेतनाएँ परस्पर विलीन होने लगती हैं और शिष्य केवल जानने वाला नहीं बल्कि गुरु-चेतना में प्रतिष्ठित होने लगता है.. यह पारदर्शिता अमृत के समान है जो केवल योग्य पात्र को ही प्राप्त होती है... जहाँ यह होती है, वहाँ न संकोच रहता है और न भय... गुरु का आशीर्वाद तब औपचारिक शब्द नहीं है बल्कि शिष्य की संपूर्ण साधना के साथ चलने वाली सतत उपस्थिति बन जाता है... जो शिष्य इस पारदर्शिता को बिना किसी दिखावे, प्रस्तुति या मानसिक बल से साध लेता है... वह गुरुकृपा का अनवरत पात्र बन जाता है... तब उसकी साधना, उसका जीवन और उसकी चेतना आदि सब एक दिव्य यज्ञ में परिणत हो जाते हैं... प्रो. सविता शाही
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