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Divine World Mission

खुद को समझो, बाकी दुनिया छल है

23 Mar 2026
“खुद को समझो, बाकी दुनिया छल है”... यह साधना का महामंत्र है... जब तक मनुष्य बाहरी जगत की चकाचौंध में उलझा रहता है... तब तक वह अपने ही अस्तित्व की ज्योति से अनभिज्ञ रहता है... वह दूसरों को जानने में जीवन व्यतीत कर देता है परन्तु स्वयं को कभी नहीं देखता व ना समझने की कोशिश करता है... और यही अज्ञान उसकी सभी पीड़ाओं, भय और भ्रमों का मूल कारण बन जाता है... यह संसार छल क्यों प्रतीत होता है? क्योंकि यह इंद्रियों से देखे गए अनुभवों का मायाजाल है... क्षणभंगुर... परिवर्तनीय... मोहक... यहाँ जो आज सत्य प्रतीत होता है... वह कल असत्य सिद्ध हो जाता है... संबंध, परिस्थितियाँ, वचन, वासनाएँ सब कुछ बदलता रहता है... इसीलिए आध्यात्मिक जगत में कहा है कि “जगत मिथ्या है, ब्रह्म सत्य है।” जब तक दृष्टि बाहर है... छल अनिवार्य है... पर जब दृष्टि भीतर मुड़ती है... तब सब भ्रम मिटने लगता है। जो स्वयं को नहीं जानता है... वह संसार की मृगतृष्णाओं में भटकता है... कभी दूसरों की प्रशंसा में स्वयं को परिभाषित करता है... तो कभी निंदा में टूट जाता है... और कभी दूसरों के अपमानित करने से अपमान महसूस होने लगता है... क्योंकि साधक अपने ‘मैं’ को दूसरों की दृष्टि पर निर्भर कर देता है... यही निर्भरता सबसे सूक्ष्म बंधन है... आत्मा का विस्मरण... मनुष्य जब दूसरों की स्वीकृति में जीने लगता है... तब वह स्वयं से दूर होता चला जाता है... यही दूरी छल की जड़ है... परंतु साधक जब भीतर उतरता है... जब वह बाह्य जगत से दृष्टि हटाकर अपने साक्षीभाव में प्रवेश करता है... तब उसे ज्ञात होता है कि संसार वैसा नहीं है जैसा वह दिखता है... उसे यह रहस्य समझ में आने लगता है कि इस संसार के सभी रिश्ते, सभी मिलन-विछोह, केवल कर्मों का लेखा-जोखा हैं... हमारे सबसे करीबी कुछ संबंध हमारे जीवन में ऋण वसूलने आते हैं तो कुछ ऋण चुकाने और सृष्टि ने इस व्यवस्था को अत्यंत ईमानदारी से रचा है... इसमें कोई अन्याय नहीं है... कोई भूल नहीं है...केवल हमारी बुद्धि जो सीमित है इस व्यापक और सार्वभौमिक न्याय को समझ नहीं पाती है .. जो साधक इस रहस्य को जान लेता है वह किसी से शिकायत नहीं करता है... वह समझ जाता है कि जो कुछ भी घट रहा है, वह उसी के कर्मों का प्रतिफल है... सटीक... संतुलित और न्यायपूर्ण... तब उसके भीतर करुणा जागती है... वह जान जाता है कि संसार छल नहीं है केवल कर्म का दर्पण है जो हमारे भीतर को बाहर दिखा देता है और जब यह बोध प्रकट होता है, तब वह किसी से रुष्ट नहीं होता है...न मित्र से... न शत्रु से... यह आत्मबोध कोई विचार नहीं है बल्कि अनुभव है... जब मन शांत हो जाता है, जब चेतना अंतर्मुख होती है... तब साधक अपने भीतर उस सत्ता का साक्षात्कार करता है जो अपरिवर्तनीय है जो समय और स्थान से परे है... वही आत्मा है... वही परमात्मा का अंश है... उस अनुभूति के बाद संसार का कोई छल उसे छू नहीं सकता है...तब व्यक्ति बाहरी परिस्थितियों में नहीं बहता है...वह केवल अपने भीतर के आलोक में स्थित रहता है... जो साधक स्वयं को जान गया.. उसके लिए धोखा नाम का कोई अस्तित्व नहीं रहता है क्योंकि धोखा वहीं संभव है जहाँ ‘मैं’ और ‘दूसरे’ का भाव है... परन्तु जब साधक जान लेता है कि सब उसी से उत्पन्न हैं... सब उसी में विलीन हैं... तब यह विभाजन समाप्त हो जाता है... तब वह देखता है कि जिसे वह छल कहता था... वह भी उसी एक सत्ता का लीलामय अभिनय था... मनोरम... गहन... पर असार। अतः साधक यदि तू शांति चाहता है... तो बाहरी जगत को नहीं अपने भीतर की चेतना को जान... दूसरों के कर्मों को समझने की चेष्टा मत कर... अपने कर्मों के बंधनों को पहचान... यह संसार एक न्यायपूर्ण विद्यालय है... यहाँ कोई अन्याय नहीं होता है... केवल अज्ञान होता है... और जब यह अज्ञान मिटता है, तब व्यक्ति देखता है कि सब कुछ ठीक उसी तरह घटा है जैसा होना चाहिए था... खुद को समझना ही अध्यात्म का आरंभ है और वही मुक्ति का अंत...जो स्वयं को जान गया...वह जान गया कि यह संसार न सत्य है, न असत्य...वह केवल एक दर्पण है जिसमें आत्मा अपना ही प्रतिबिंब देखती है...और जब यह बोध प्रकट होता है, तब साधक मौन हो जाता है…क्योंकि वहाँ कोई छल नहीं है...कोई ऋण नहीं...केवल स्वयं है... निर्मल... निश्चल...अनंत.. प्रो. सविता शाही
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