+91 7881133302
info@divineworldmission.com
Lucknow, UP
EN
HINDI
Home
About
About Divine World Mission
About Guru Mandal
About Guru Ji
Founder's Message
Executive Committee
Sadhana Path
Sanjeevani Sadhana
Levels of Sadhana
Eligibility & Discipline
Divine Insight
Daily Insight
Blogs
Spiritual Articles
Books & Publications
Program
Upcoming Sadhana Samagam
Past Sadhana Samagam
Divine Resources
Photo Gallery
Audio Library
Video Library
Divine sound (Mantra)
Contact
Join Us
Divine World Mission
Home
About
About Us
About Guru Mandal
About Guru Ji
Founder's Message
Executive Committee
Sadhana Path
Sanjeevani Sadhana
Levels of Sadhana
Eligibility & Discipline
Divine Insight
Daily Insight
Blogs
Spiritual Articles
Books & Publications
Divine Resources
Photo Gallery
Audio Library
Video Library
Divine sound (Mantra)
Program
Upcoming Sadhana Samagam
Past Sadhana Samagam
Executive Committee
Contact
Join Us
Home
›
Blog
›
ध्यान में उचटता हुआ मन : साधक की अग्नि परीक्षा
“Every blog is a step closer to inner awakening.”
“हर ब्लॉग आत्मिक जागृति की ओर एक कदम है।”
ध्यान में उचटता हुआ मन : साधक की अग्नि परीक्षा
21 May 2026
ध्यान की प्रक्रिया किसी बगीचे में फूल और सुगंध चुनने जैसी सरल नहीं होती है.... यह भीतर के वन में उतरने जैसा है... जहाँ अंधकार भी है... काँटे भी हैं... और कहीं गहराई में छिपा है अमृत-स्रोत भी... साधक जब ध्यान की प्रथम सीढ़ियों पर होता है... तब मन कभी शांत दिखता है... कभी तूफ़ान बन उठता है... अनेक बार लगता है कि ध्यान में बैठते ही मन पहले से अधिक चंचल हो गया है... विचारों की भीड़,... स्मृतियों का कोलाहल... भीतर का अज्ञात असंतोष उठ खड़ा होता है... यह सब देखकर साधक का मन भयभीत हो जाता है कि “क्या मेरी साधना व्यर्थ जा रही है...?” पर वास्तव में यही तो साधना का प्रारंभिक यथार्थ है... जब मन ध्यान में उचटने लगे तो समझो कि भीतर की गहराइयों में हलचल आरंभ हो चुकी है... वह शांति जो अभी तक सतही थी... अब मिट रही है... और मन की जड़ों में छिपे संस्कार, वासनाएँ, और दबी हुई प्रवृत्तियाँ प्रकाश में आ रही हैं... साधना का आरंभिक काल इसी संघर्ष से भरा होता है... मन वह घोड़ा है जो वर्षों से संसार के रथ पर दौड़ता रहा है... जब साधक उसे साधना के मार्ग पर मोड़ना चाहता है... तब वह स्वाभाविक रूप से उछलता है... भागता है... विरोध करता है... लेकिन जो साधक धैर्य रखता है वही अंततः उस मन को नियंत्रित कर पाता है और उस पर आरूढ़ होकर ब्रह्मपथ की ओर अग्रसर होता है... मन का उचटना कोई दोष नहीं है... यह एक संकेत है कि साधक भीतर उतर रहा है... जैसे गंगा जब पर्वतों से उतरती है... तब प्रारंभ में तीव्र गति से बहती है... चट्टानों से टकराती है... फेन उठाती है...लेकिन अंततः जब वह मैदान में आती है, तब शांत, गंभीर, और व्यापक हो जाती है... वैसे ही साधक का मन भी प्रारंभ में अशांत होता है फिर धीरे-धीरे गहराता है... ध्यान में आने वाली यह उथल-पुथल साधना की शुद्धि का अंग है... यह भीतर के संस्कारों का विसर्जन है... गुरुओं ने कहा है कि "यदा यदा ध्याने मनः चलति, तदा तदा तं पुनः प्रत्याहरेत्।"... अर्थात् जब-जब ध्यान में मन भटक जाए... तब-तब उसे पुनः लौटा लाओ... यही पुनरावृत्ति धीरे-धीरे मन को प्रशिक्षित करती है... ध्यान में उचटता मन यह नहीं दर्शाता कि साधक गिर गया है बल्कि यह दर्शाता है कि वह भीतर के वास्तविक द्वार तक पहुँच रहा है... ध्यान का सार लगातार लौटना है... हर बार जब मन भागे और तुम उसे प्रेमपूर्वक वापस लाओ...वही क्षण साधना का क्षण होता है... मन को रोकना नहीं है... समझाना होता है... दबाना नहीं है...दिशा देना होता है... धीरे-धीरे वही मन जो आज उचट रहा है एक दिन तुम्हारे साथ मौन में विलीन हो जाएगा... तब न विचार रहेंगे... न विरोध... केवल शून्य बचेगा और उस शून्य में दिव्य उपस्थिति का अनुभव होगा... इसलिए जब मन उचटे तो व्याकुल न हों... यह साधक की अग्नि-परीक्षा है... जो इसे पार कर जाता है... वही ध्यान के सच्चे स्वाद तक पहुँचता है... भीतर की यह अस्थिरता दरअसल स्थिरता की प्रस्तावना है... जैसे प्रभात से पहले रात्रि सबसे गहरी होती है वैसे ही ध्यान की स्थिरता से पहले मन की चंचलता अपने चरम पर पहुँचती है... जो साधक इस रहस्य को जान लेता है वह उचटते मन से युद्ध नहीं करता है... वह मुस्कुराता है... मौन रहता है और जानता है कि यह भीतर के परिवर्तन की प्रथम आहट है... धीरे-धीरे वही उचटता मन एकाग्रता में बदल जाता है और एक दिन वह ध्यान स्वयं ध्यानकर्ता को मिटा देता है... तब केवल अहं ब्रह्मास्मि का अनुभव शेष रह जाता है... जहाँ कोई भटकाव नहीं है... कोई प्रयास नहीं... केवल परम मौन की अनंत उपस्थिति है...
Share this:
Latest Blogs
ध्यान में उचटता हुआ मन : साधक की अग्नि परीक्षा
आत्मा का द्वंद्व और एकांत साधना
गुरु में मोह को साधक कैसे पा सकते हैं?
शिष्य की तैयारी ही गुरु को प्रकट करती है
गुरु सानिध्य का समय: चेतना के जागरण का सूक्ष्म आयाम