+91 7881133302
info@divineworldmission.com
Lucknow, UP
EN
HINDI
Home
About
About Divine World Mission
About Guru Mandal
About Guru Ji
Founder's Message
Executive Committee
Sadhana Path
Sanjeevani Sadhana
Levels of Sadhana
Eligibility & Discipline
Divine Insight
Daily Insight
Blogs
Spiritual Articles
Books & Publications
Program
Upcoming Sadhana Samagam
Past Sadhana Samagam
Divine Resources
Photo Gallery
Audio Library
Video Library
Divine sound (Mantra)
Contact
Join Us
Divine World Mission
Home
About
About Us
About Guru Mandal
About Guru Ji
Founder's Message
Executive Committee
Sadhana Path
Sanjeevani Sadhana
Levels of Sadhana
Eligibility & Discipline
Divine Insight
Daily Insight
Blogs
Spiritual Articles
Books & Publications
Divine Resources
Photo Gallery
Audio Library
Video Library
Divine sound (Mantra)
Program
Upcoming Sadhana Samagam
Past Sadhana Samagam
Executive Committee
Contact
Join Us
Home
›
Blog
›
शिष्य की तैयारी ही गुरु को प्रकट करती है
“Every blog is a step closer to inner awakening.”
“हर ब्लॉग आत्मिक जागृति की ओर एक कदम है।”
शिष्य की तैयारी ही गुरु को प्रकट करती है
18 May 2026
गुरु कोई साधारण व्यक्ति नहीं होते हो... बल्कि एक ऐसी दिव्य चेतना होते हैं जो हर जीव के भीतर पहले से ही मौजूद होती है... परन्तु जब तक हमारा मन अशुद्ध होता है और जब तक हमारे चित्त पर अज्ञान का पर्दा होता है... तब तक यह गुरु-तत्त्व हमारे लिए छिपा रहता है... जैसे सूरज आकाश में हमेशा रहता है लेकिन कोहरे की वजह से दिखाई नहीं देता है.... वैसे ही गुरु भी हमारे भीतर होते हैं परन्तु हम उन्हें नहीं देख पाते है... जैसे ही शिष्य की आंतरिक तैयारी शुरू होती है, वैसे ही यह छिपा हुआ गुरु-प्रकाश चमकने लगता है... मुण्डकोपनिषद् कहती है कि "नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न बहुधा श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः"... अर्थात आत्मा न तो भाषण से... न ही पढ़ने-सुनने से मिलती है... वह केवल उसी को मिलती है जो खुद को उसके योग्य बनाता है.... शिष्य की तैयारी का पहला कदम है चित्त की शुद्धि अर्थात मन की सफाई... जब तक हमारे मन के भीतर राग-द्वेष, वासना और अशुद्ध विचारों की धूल जमी रहती है... तब तक गुरु के पास होकर भी गुरु की वास्तविक झलक नहीं मिलती है... गीता कहती है कि "चित्तस्य शुद्धये कर्म" अर्थात कर्म का उद्देश्य है चित्त की शुद्धि होता है... जब शिष्य सच्चे मन से अच्छे कर्म करता है और संयम से जीवन जीता है... तब मन का दर्पण साफ होता है और गुरु उसमें साफ दिखाई देने लगते हैं... दूसरा आवश्यक गुण है श्रद्धा... श्रद्धा सिर्फ विश्वास नहीं होता है... बल्कि वह भावना है जो शिष्य के चित्त को गुरु की तरंगों से जोड़ती है... गीता कहती है कि "श्रद्धावान् लभते ज्ञानं"... अर्थात श्रद्धा रखने वाला ही ज्ञान को प्राप्त करता है... जब किसी शिष्य में गहरी श्रद्धा होती है... तो गुरु-शक्ति उसकी ओर स्वतः आकर्षित होती है...जैसे चुम्बक लोहे को खींचता है... तीसरी बात है समर्पण और मौन... जब शिष्य अपने अहंकार को छोड़ देता है और मौन हो जाता है... तब उसे गुरु की सच्ची अनुभूति होती है... मौन केवल चुप रहना नहीं होता है...बल्कि भीतर की पूर्ण तैयारी है...कठोपनिषद् कहती है कि "यदा पश्यः पश्यते रूक्मवर्णं "… अर्थात जब देखने वाला मौन होकर ध्यान से भीतर झांकता है... तभी उसे स्वर्ण-रूप गुरु का दर्शन होता है... एक और अत्यंत महत्वपूर्ण बात है मुमुक्षुत्व... यानि मुक्ति की तीव्र इच्छा... गुरु कोई सामान्य शिक्षक नहीं होते है वे तो मुक्ति के प्रतीक होते हैं... इसलिए जिस शिष्य में मुक्ति की सच्ची प्यास होती है... वहीं गुरु का प्रकाश प्रकट होता है...श्वेताश्वतर उपनिषद् कहती है कि..."यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ"... अर्थात जिसकी भक्ति देवता और गुरु दोनों में समान होती है... उसी के लिए तत्त्वज्ञान प्रकट होता है... अंतिम अभ्यास साधना का अभ्यास होता है...लेकिन केवल साधना करना ही नहीं... बल्कि साधना प्रेम और श्रद्धा से करना जरूरी होता है... जब शिष्य की साधना गुरु की लय में झूमने लगती है... तब गुरु की ऊर्जा उसके जीवन में उतरती है... गुरु का एक दृष्टिपात, एक स्पर्श, एक मौन संकेत ही शिष्य की चेतना को रूपांतरित कर देता है.... यही होता है संजीवन-स्पर्श जब शिष्य इस प्रकार पूरी तरह से तैयार हो जाता है, तब गुरु दो स्तरों पर प्रकट होते हैं पहला...बाह्य रूप में जब शिष्य किसी देहधारी सद्गुरु से मिलता है, जो उसे ज्ञान की ओर ले जाते हैं... यहां शिष्य की आंतरिक तैयारी ही वह आंख बनती है जिससे वह भीड़ में अपने सच्चे गुरु को पहचान पाता है... दूसरा भीतर जागरण के रूप में... यहां गुरु का देहधारी रूप केवल एक माध्यम होता है... शिष्य के भीतर स्वयं गुरु-तत्त्व जागता है... वह गुरु अब बाहर ही नहीं... उसके भीतर की आवाज बन जाता है... दार्शनिक दृष्टि से इसे कहते हैं प्रतिभा से प्रत्यवसाय की यात्रा... मतलब पहले गुरु एक प्रकाश की तरह दिखाई देते हैं... फिर वह प्रकाश भीतर आत्म-चेतना में बदल जाता है... और फिर गुरु और शिष्य का भेद मिट जाता है...तब शिष्य अनुभव करता है कि "गुरुपरब्रह्म त्वमेवाहम् " हे गुरु! अब मैं जान गया हूँ कि आप ही मैं हूँ... और हम ही आप है... अंत में... शिष्य की तैयारी उस करघे की तरह है जिस पर अदृश्य सूतों से गुरु की दिव्यता का वस्त्र बुना जाता है... जैसे ही यह वस्त्र पूर्ण होता है, गुरु प्रकट हो जाते हैं... लेकिन वास्तविकता यह है कि गुरु पहले से ही वहीं थे...फर्क सिर्फ इतना था कि शिष्य को देखने की शक्ति अब प्राप्त हुई... इसलिए यह बात केवल कोई सुंदर कहावत नहीं कि " शिष्य की तैयारी गुरु को प्रकट करती है" बल्कि यह आध्यात्मिक विज्ञान का एक अटूट नियम है... गुरु-तत्त्व सदा विद्यमान है... शिष्य का निर्मल अंतःकरण ही उसे दर्शन का पात्र बनाता है... और जब यह मिलन होता है.... तो शिष्य समझता है कि पूरी यात्रा कहीं बाहर नहीं, केवल भीतर ही थी... वही गुरु, वही शिष्य, वही सत्य सब एक ही अखण्ड ब्रह्मस्वरूप हैं।
Share this:
Latest Blogs
ध्यान में उचटता हुआ मन : साधक की अग्नि परीक्षा
आत्मा का द्वंद्व और एकांत साधना
गुरु में मोह को साधक कैसे पा सकते हैं?
शिष्य की तैयारी ही गुरु को प्रकट करती है
गुरु सानिध्य का समय: चेतना के जागरण का सूक्ष्म आयाम