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गुरु में मोह को साधक कैसे पा सकते हैं?

19 May 2026
गुरु में मोह साधना की परम गहराई में उतरने की अनुभूति है... यह मोह सांसारिक नहीं होता है... यह वह मोह है जो आत्मा को ईश्वर की ओर आकृष्ट करता है जो साधक को देह, मन और जगत की सीमाओं से ऊपर उठा देता है... जब साधक के भीतर यह दिव्य मोह अंकुरित होता है... तब उसका जीवन बाह्य आचरण से नहीं बल्कि भीतर के अनुराग से संचालित होता है... इस मोह को पाने के लिए साधक को सबसे पहले स्वयं का परिशोधन करना होता है... जब तक भीतर अहंकार, वासना, अपेक्षा और पहचान का भ्रम जीवित हैं तब तक गुरु के प्रति सच्चा मोह उत्पन्न नहीं हो सकता है... गुरु में मोह तब ही संभव है जब साधक अपने भीतर के विकारों को शुद्ध कर दे... जब उसके हृदय का पात्र निर्मल और पारदर्शी बन जाए... गुरु का स्वरूप केवल शरीर, वाणी या व्यक्तित्व तक सीमित नहीं है... वे उस चेतन तत्व के प्रतीक हैं जो सर्वत्र विद्यमान है... जब साधक इस सत्य को मनन करता है कि गुरु केवल व्यक्ति नहीं है बल्कि परम तत्व का माध्यम हैं...तब उसके भीतर गुरु में मोह का बीज अंकुरित होता है... यह मोह देह के प्रति नहीं बल्कि चैतन्य के प्रति आकर्षण होता है... वही मोह साधक को समर्पण की ओर ले जाता है और उसके भीतर के अहंकार को गलाने लगता है... इस दिव्य मोह की साधना का दूसरा आधार है सतत स्मरण... साधक को हर दिन गुरु के उपदेशों, उनकी वाणी, उनके जीवन और उनके अनुग्रह का स्मरण करना चाहिए... यह स्मरण केवल श्रद्धा का अभ्यास नहीं बल्कि आत्मा की गहराई में उतरने का मार्ग है... जब साधक गुरु के प्रत्येक शब्द में ईश्वर की वाणी सुनता है... उनके हर कर्म में दिव्यता का प्रकाश देखता है...तब उसके भीतर एक ऐसा मोह जन्म लेता है जो संसार के सभी बंधनों से परे होता है... गुरु में मोह का तीसरा रहस्य है एकांत साधना... जब साधक एकांत में बैठकर गुरु का ध्यान करता है, उनके स्वरूप, उनकी दृष्टि या उनके आशीष का चिंतन करता है... तब उसके भीतर एक अलौकिक आकर्षण जागता है... यह मोह बंधन नहीं बनता, बल्कि मुक्ति का द्वार खोलता है... उसी नीरवता में साधक का अहं गलने लगता है और उसके भीतर गुरु का स्वरूप प्रकाशमान हो उठता है... परंतु इस मार्ग की सबसे ऊँची सीढ़ी है निःस्वार्थ समर्पण... जब तक साधक के मन में गुरु से पाने की आकांक्षा रहती है.....चाहे वह ज्ञान, कृपा या सिद्धि ही क्यों न हो... तब तक मोह शुद्ध नहीं होता... गुरु में सच्चा मोह तब उत्पन्न होता है जब साधक केवल देना चाहता है केवल अर्पित होना चाहता है, बिना किसी शर्त, बिना किसी अपेक्षा के... और जब यह मोह हृदय में गहराई से उतर जाता है तब साधक के लिए संसार के मत, समाज की राय या दूसरों के विचार अर्थहीन हो जाते हैं... यदि साधक के हृदय में गुरु के प्रति यह दिव्य मोह उत्पन्न हो जाए तो उसे समाज को कोई स्पष्टीकरण देने की आवश्यकता नहीं रहती... समाज उसे अच्छा कहे या बुरा...वह सब अप्रासंगिक हो जाता है क्योंकि उसकी आत्मा जानती है कि भीतर क्या स्थिति है... गुरु में मोह रखने वाला साधक अपने अंतःकरण से संचालित होता है न कि बाह्य दुनिया के निर्णयों से... उसके लिए एकमात्र साक्षी उसकी आत्मा और गुरु की चेतना होती है... धीरे-धीरे यह मोह प्रेम में रूपांतरित होता है और प्रेम ज्ञान में परिवर्तित हो जाता है... साधक समझ जाता है कि गुरु ने कभी उसे छोड़ा नहीं है बल्कि हर क्षण उसके भीतर ही विराजमान रहे... जब यह अनुभव घटित होता है तब गुरु और शिष्य के बीच का भेद मिट जाता है... गुरु बाहर नहीं, भीतर के प्रकाश में प्रकट होते हैं... यही मोह का परम रूप है जहाँ गुरु और शिष्य एक ही चेतना में विलीन हो जाते हैं... और यही वह बिंदु है जहाँ साधक यह अनुभव करता है कि गुरु के कहे अनुसार की गई कुछ विशिष्ट साधनाएँ ही पर्याप्त हैं... अब उसके लिए किसी बाह्य अनुष्ठान, दीक्षा या विशेष प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं रहती है क्योंकि जो साधना गुरु ने उसके हृदय में बोई थी....वही भीतर उतरकर उसके जीवन को सार्थक बना देती है... गुरु द्वारा बताए गए कुछ साधना-सूत्र यदि आत्मा में गहराई तक उतर जाएँ तो वही साधक के समस्त जन्मों का फल बन जाते हैं... उस अवस्था में गुरुजी के द्वारा कराई गई बाहरी साधना गौण हो जाती है क्योंकि अब साधना भीतर घट रही होती है... शिष्य के हृदय में... जब साधक इस स्थिति को पा लेता है तब वह जान लेता है कि गुरु केवल मार्गदर्शक नहीं है बल्कि उसी मार्ग का आत्मतत्त्व हैं... गुरु में मोह का चरम रहस्य यही है...यह मोह साधक को बाँधता नहीं है... बल्कि मुक्त करता है... यह मोह संसारिक नहीं ब्रह्मिक होता है... साधक जब इस मोह को पा लेता है तब वह जान जाता है कि गुरु केवल शिक्षक नहीं है बल्कि चेतना का अनंत स्रोत हैं... उनके प्रति उत्पन्न यह मोह आत्मा को परमात्मा से जोड़ देता है... वही अद्वैत की अनुभूति है...जहाँ शिष्य का “मैं” समाप्त होकर गुरु के “तत्त्व” में समाहित हो जाता है... ऐसा साधक अब समाज, लोक और आलोचना से परे होता है क्योंकि उसका जीवन अब किसी बाहरी स्वीकृति का नहीं केवल भीतर की साक्षी चेतना का विषय बन जाता है... यही गुरु में मोह का परम रहस्य है जो साधक को प्रेम, समर्पण और ब्रह्म की एकरसता में स्थिर कर देता है...
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