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आस्था, विज्ञान और शिव

मेरे विचार से चमत्कार का ही दूसरा नाम ईश्वर है ।ईश्वरत्व को समझना केवल तभी सम्भव हुआ है जब उनके प्रति श्रद्धा , विश्वास और तर्कहीन समर्पण के भाव से विश्वास करने की शक्ति स्वयं में पैदा करने के प्रयास में सफलता हासिल करने की क्षमता पैदा कर सकें। वैज्ञानिक, विज्ञान के माध्यम से ईश्वर की रचना से मुक़ाबला करने के लिए सदियों से प्रयासरत हैं परंतु विज्ञान की पहुँच अभी ईश्वर की रचना से बहुत दूर है । वैज्ञानिक सिद्धांत प्रयोग की कसौटियों पर अनेक बार परीक्षण करने के बाद प्रतिपादित किए जाते हैं और हम निरंतर उसका प्रयोग करते हुए सफलता के नए आयाम स्थापित कर रहे हैं , फिर भी हम सब जब कभी इसका प्रयोग ईश्वर की रचना को प्रतिस्पर्धात्मक स्वरूप देते हुए करते हैं तो ऐसा लगता है कि हमारी यात्रा तो अभी अपने प्रारम्भिक चरण में ही है। भगवान का अनेक रूपों में प्रकट होना, दैवीय शक्तियों के विराट दर्शन,शास्त्रों , वेदों , पुराणों और अनेक ग्रंथों की रचनाओं में ही सम्पूर्ण विज्ञान और पूरा दर्शन शास्त्र अन्तर्निहित है और उनके अध्ययन से ज्ञात होता है कि आज हम जिसका आविष्कार करने की सफलता से उत्साहित होते हैं, वह सब उसमें पहले से ही ब्याख्यायित है। यह विषय बहुत विस्तृत है और चर्चा अन्तहीन है और विषयांतर भी हो रहा है। इसलिए मैं अपनी जिस बात को कहना चाह रहा था, उस पर आता हूँ । कल मैं नैमिषारण्य की तीर्थ नगरी में था। वहाँ से ७ किमी की दूरी पर गोमती नदी के तट पर रूद्रावर्त धाम , भगवान शिव का स्थान है। यहाँ पाताल शिव का वास है। पूज्य गुरु जी ने मुझे पिछले शाम को इस स्थान के बारे में बताया था । विवरण सुनकर स्वयं को रोक पाना मुश्किल हो रहा था और मुझे वहाँ रामायण की पूर्णता के भंडारे में जाना भी था। इसलिए मैं अगले दिन वहाँ गया । विज्ञान का छात्र होने के नाते उस विवरण पर विश्वास करने मे कठिनाई तो थी परन्तु जब उसे देखने का अवसर मिला तो निस्संदेह दृश्य अकल्पनीय था ।भगवान शिव शिवा और ईश्वर में अटूट विश्वास रखने के कारण उस समय कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं लगा। भगवान को प्रसाद में विल्वपत्र और फल वहाँ मिल रहा था। ऊं नमः शिवाय के मंत्र से जब विल्वपत्र जल के अन्दर स्थित शिवलिंग पर अर्पित किया गया तो सारे विल्वपत्र जल में नीचे बैठ गये और फल के रूप में अर्पित आम, अनार, केला और मौसमी जल में नीचे जाकर प्रसाद के रूप में ऊपर आ गये और जिसकी कामना शिव जी को ग्रहण करने की प्रार्थना के साथ किया , वह वहीं नीचे जल में स्थिर हो गया। यहीं विज्ञान अनुत्तरित है । आस्था और विश्वास ऊपर है और यही ईश्वरीय शक्ति का जीता जागता प्रमाण है । परमपूज्य गुरू जी के सानिध्य और चरणों में समर्पित हो जाने के बाद अब तो वैसे भी कुछ आश्चर्य जनक नहीं लगता है। पूज्य गुरु जी के दिखाए साधना के मार्ग पर चलने का बोध, भक्त और भक्ति के बीच की दूरी का शून्य हो जाना ही (वैसे ही है जैसे दूध और जल का मिश्रण )ईश्वरत्व का प्रमाण है। यह कोई बहुत आसान बात भी नहीं है। वर्षों की सतत साधना से इस दिशा में सफलता प्राप्त होती है। एक साधक के रूप में मेरा अनुभव निराशाजनक तो नहीं है और ईश्वर ने तो निराश शब्द का निर्माण किया ही नहीं है। निराश शब्द की उत्पत्ति तो हमारे अनास्था पूर्ण और आधे अधूरे मन से किये गए कार्यों के परिणाम स्वरूप होती है ।
“जब विचार शुद्ध होते हैं, तभी जीवन की दिशा बदलती है।”